मीडिया टाइम अपार्टमेंट, इंदिरापुरम में रविवार को एक भव्य काव्य गोष्ठी एवं नवगीत परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के अनेक प्रतिष्ठित कवियों, गीतकारों एवं साहित्यकारों ने सहभागिता की। यह कार्यक्रम साहित्य, कविता और नवगीत की समकालीन भूमिका पर सार्थक विमर्श तथा उत्कृष्ट काव्य-पाठ के लिए विशेष रूप से स्मरणीय रहा।

कार्यक्रम का शुभारम्भ नवगीत आन्दोलन के पुरोधा एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री राधेश्याम बंधु के विचारोत्तेजक वक्तव्य से हुआ। उन्होंने गीत और नवगीत के स्वरूप एवं अंतरों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि छायावाद काल से चली आ रही अनेक रूढ़ प्रतिमाओं के कारण पारम्परिक गीतों में एक प्रकार का बासीपन आ गया था। उन्होंने नवगीत को जनचेतना का सशक्त माध्यम बताते हुए उसकी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी विशेषताओं का उल्लेख किया।
काव्य-पाठ सत्र का आरम्भ सांसद टीवी में कार्यरत गीतकार श्री दीपक वर्मा ने किया। उनके समसामयिक गीतों को सभी ने खूब सराहा। उनकी पंक्तियाँ—
“यह घुटन है कैसी, यह गर्दोगुबार कैसा है,
बड़े शहरों का माहौल इतना बेकार कैसा है।
रंग चेहरों का उड़ गया तनाव भरी गंध से,
यह हवा में घुली मौत का कारोबार कैसा है।”
—विशेष रूप से चर्चित रहीं।

इसके उपरान्त संसद टीवी से जुड़े सुप्रसिद्ध गीतकार श्री दिनेश आनन्द ने स्त्री-शक्ति पर आधारित अपने ओजस्वी गीत का पाठ किया। उनकी पंक्तियाँ—
“ज्योति सी प्रचण्ड स्त्री, साम-दाम-दण्ड स्त्री,
निज तेज से पर्वत हिला कर दे खण्ड-खण्ड स्त्री।
—श्रोताओं द्वारा खूब सराही गईं।
कवि ,समालोचक और शिक्षक डॉ. सुशील द्विवेदी ने अपनी मुक्तछन्द कविताओं के माध्यम से समकालीन जीवन की विविध अनुभूतियों को अभिव्यक्ति दी और उपस्थित जनों की प्रशंसा प्राप्त की। इसके बाद राज्यसभा सचिवालय में संयुक्त निदेशक तथा देश के सुप्रसिद्ध रचनाकार श्री पीयूष कान्ति ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। उनकी इन पंक्तियों ने विशेष रूप से श्रोताओं को प्रभावित किया—
“मनु-शतरूपा आदम हब्बा एडम—ईव सुने हैं
सबने अपने-अपने रचयिता, अपने जनक चुने हैं।
तुम कहते हो इनसे उनसे जन्मा यह संसार,
मैं कहता हूँ इस सृष्टि का जनक एक है—प्यार।”
सुप्रसिद्ध गीतकार एवं शायर श्री शिवकुमार बिलगरामी ने राम-स्तुति के साथ अपने गीतों का पाठ किया। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं और विश्व-बंधुत्व का संदेश मुखरित हुआ। उनकी निम्न पंक्तियाँ विशेष रूप से सराही गईं—
“मनुजता मिटेगी तो फिर क्या बचेगा,
विधाता न फिर से यह दुनिया रचेगा।”
इसी मृत्तिका में है मिलना सभी को
मगर मृत्यु का नाच किसको जंचेगा
दहन शक्ति से मत मिटाओ मनुजता
दहन शक्ति है तो अंधेरा मिटाओ
बहुत ही घना है अँधेरा घृणा का
हृदय-दीप में नेह-बाती जलाओ।”

अक्षर भारती साहित्यिक संस्था के प्रमुख श्री अक्षय जैन ने अपने काव्य-पाठ के साथ-साथ साहित्यिक पठन-पाठन की घटती प्रवृत्ति की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया तथा जैन दर्शन की मानवीय विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
वरिष्ठ गीतकार डॉ. ओंकार त्रिपाठी ने अपने गीतों एवं नवगीतों का प्रभावपूर्ण पाठ किया। उनके समसामयिक नवगीत की पंक्तियाँ—
“बरगद की छाँव परेशान,
उगल रहा आग आसमान,
पात झुलस गए, मुरझाई डाली,
लता कांतिहीन हुई
लू की पी प्याली
पीपल के सूख रहे प्राण,
उगल रहा आग आसमान।”
—श्रोताओं के बीच विशेष चर्चा का विषय रहीं।
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि बाबा कानपुरी ने अपने व्यंग्य-पाठ से वातावरण में हास्य और चिंतन का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। उनकी पंक्तियों पर उपस्थित जनों ने भरपूर तालियाँ बजाईं—
जो खाते हैं भरपेट उन्हें भूखा नंगा बतलाते हैं
कटे फटे से पहन के कपड़े सुपरस्टार बन जाते हैं
“परिभाषा ही बदल गई है अब तो बेईमानों की,
वे कट्टर ईमानदार अब अपने को बतलाते हैं।”
अध्यक्षीय काव्य-पाठ में श्री राधेश्याम बंधु ने अपने अनेक नवगीत प्रस्तुत किए। साथ ही उन्होंने युवा रचनाकारों को संबोधित करते हुए कविता के उद्देश्य, नवीन बिम्बों एवं प्रतीकों के प्रयोग तथा जनचेतना के प्रसार में साहित्य की भूमिका पर महत्वपूर्ण विचार रखे।
कार्यक्रम के अंत में गोष्ठी के आयोजक श्री शिवकुमार बिलगरामी ने सभी आमंत्रित कवियों, साहित्यकारों तथा उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे साहित्यिक आयोजन समाज में संवेदनशीलता, संवाद और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह आयोजन साहित्य, नवगीत और समकालीन सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित रचनाकारों के लिए एक यादगार एवं प्रेरणास्पद अवसर सिद्ध हुआ।

